“होली के रंग में रंगे नेताजी—विपक्ष से गले भी मिले, वोट भी दिए!”


होली आते ही नेताजी का दिल इतना बड़ा हो गया कि पार्टी से ज्यादा उन्हें विपक्ष का प्यार भाने लगा! कहते हैं, “होली में दुश्मन भी गले मिलते हैं,” लेकिन नेताजी तो पूरे जोश में आकर क्रॉस-वोटिंग तक कर बैठे।



🎭 पहला रंग—’साहब, हमें होली मनानी थी, गलती से वोट दे दिया!’

तीनों नेताजी ने पहले कहा कि उन्होंने रंगों में मस्ती करते हुए गलती से विपक्ष को वोट दे दिया। एक बोले, “भांग वाली ठंडाई का असर था, ईवीएम का बटन गुलाबी दिखा, सो दबा दिया!” दूसरे बोले, “हमें लगा, ये भी कोई नया होली का गेम है!”


🎭 दूसरा रंग—’हमने दोस्ती निभाई, विचारधारा गई तेल लेने!’

जब पार्टी ने सवाल उठाया कि “भैया, ये क्या किया?” तो नेताजी बोले—”हमारे बचपन के दोस्त विपक्ष में थे, अब दोस्ती निभाने के लिए पार्टी से थोड़ी बगावत कर दी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?” जनता बोली—”साहब, दोस्ती में इतना गिफ्ट कोई नहीं देता जितना आपने विपक्ष को उपाध्यक्ष की कुर्सी गिफ्ट कर दी!”

🎭 तीसरा रंग—’हम विपक्ष के थे ही नहीं, गलती से आपकी पार्टी में आ गए थे!’

तीसरे नेताजी की सफाई सबसे अनोखी थी। उन्होंने कहा, “देखिए, असली बात ये है कि हम तो हमेशा से विपक्ष के थे, बस गलती से आपकी पार्टी में आ गए थे। अब होली के मौके पर सही रंग पहचान लिया!”

🎭 चौथा रंग—’होली में सब माफ होता है, वोट भी!’

नेताजी ने जनता से हाथ जोड़कर कहा—”देखिए, होली मस्ती का त्योहार है। अगर गलती से विपक्ष को वोट चला भी गया, तो इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? जैसे होली में पुराने गिले-शिकवे मिट जाते हैं, वैसे ही चुनावी गलती भी भूल जाओ!”



“नेताजी के दिल में विपक्ष का गुलाल, अपनी पार्टी में हड़कंप!”

होली के बाद जब पार्टी ने इन नेताजी से जवाब मांगा, तो सभी बगलें झांकने लगे। अंदरखाने में मिठाईयां बांटी गईं, लेकिन बाहर प्रेस के सामने “भूल” कहकर पल्ला झाड़ लिया।

अब जनता पूछ रही है—”साहब, होली के रंग में जोश जोश में वोट बदला, तो क्या दीवाली तक पार्टी भी बदल देंगे?” नेताजी मुस्कुराए और बोले—”देखते रहिए, राजनीति में कुछ भी हो सकता है!”

तो भाइयों-बहनों, इस बार होली के रंग से ज्यादा नेताजी के रंग बदलने की चर्चा है!

होली है!

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