
मुंगेली (छत्तीसगढ़)।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एफ.टी.सी.) मुंगेली की अदालत ने समाज को झकझोर देने वाले एक संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने दिव्यांग (मूक-बधिर) महिला से दुष्कर्म करने वाले आरोपी मोहन जोशी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह निर्णय 12 नवंबर 2025 को पीठासीन अधिकारी राकेश कुमार सोम द्वारा सुनाया गया। यह फैसला न्यायपालिका की ओर से समाज के कमजोर और दिव्यांग वर्गों की सुरक्षा के लिए एक सशक्त संदेश माना जा रहा है।
अभियुक्त मोहन जोशी (उम्र 62 वर्ष, थाना फास्टरपुर, जिला मुंगेली) के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(ठ) एवं 376(2) के तहत आरोप सिद्ध हुए हैं।
घटना की तारीख: 21 फरवरी 2024
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने दोपहर लगभग 12:00 बजे पीड़िता के घर में घुसकर उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन दुष्कर्म किया। पीड़िता जन्म से ही श्रवण एवं वाक् बाधित है।
उस समय उसके माता-पिता खेत में और अन्य परिजन स्कूल गए हुए थे, जिससे वह घर पर अकेली थी। आरोपी ने इस स्थिति का लाभ उठाकर यह जघन्य अपराध किया।
पीड़िता के पति ने घटना के लगभग दो माह बाद, 21 अप्रैल 2025 को थाना फास्टरपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई। जब वह घर लौटा, तो पीड़िता ने रोते हुए इशारों से घटना की जानकारी दी।
न्यायालय का निर्णय
न्यायालय ने साक्ष्यों, चिकित्सीय रिपोर्ट और गवाहों के बयानों के आधार पर आरोपी को दोषी पाया। अदालत ने कहा कि “दिव्यांग पीड़िता के साथ किया गया यह अपराध समाज के नैतिक ताने-बाने पर गंभीर प्रहार है।”
चूंकि पीड़िता मूक-बधिर थी, इसलिए उसके बयान अनुवादक की सहायता से दर्ज किए गए। न्यायालय में भी अनुवादक की उपस्थिति में उसके इशारों और संकेतों का अर्थ समझकर साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। इस प्रक्रिया से न्यायालय ने सुनिश्चित किया कि पीड़िता का पक्ष पूरी संवेदनशीलता और सटीकता के साथ सुना जाए।
अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले “हिमाचल प्रदेश विरुद्ध श्रीकांत सिकरी” का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे अपराधों में कठोर दंड आवश्यक है, ताकि समाज में भय और न्याय दोनों की भावना बनी रहे।
इस मामले में शासन की ओर से अधिवक्ता रजनीकांत सिंह ठाकुर ने सशक्त और प्रभावी पैरवी करते हुए अभियोजन पक्ष को मजबूती प्रदान की। उनकी तर्कपूर्ण दलीलों, साक्ष्यों की सटीक प्रस्तुति और कानूनी प्रावधानों के प्रभावशाली प्रयोग के परिणामस्वरूप अदालत ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
यह फैसला न केवल न्याय की विजय है, बल्कि समाज में यह संदेश देता है कि कानून हर व्यक्ति को — चाहे वह दिव्यांग हो, असहाय हो या सामाजिक रूप से कमजोर — समान सुरक्षा और सम्मान का अधिकार देता है। न्यायालय की यह संवेदनशीलता और सख्ती दोनों ही न्यायिक प्रणाली की मजबूती का प्रमाण हैं।


