छत्तीसगढ़ में चुनावी तैयारियां एक मजाक बनकर रह गई हैं। जनता सनी देओल के ‘तारीख पर तारीख’ डायलॉग से इस पूरी स्थिति को जोड़कर देख रही है। हर जगह लोगों की एक ही चर्चा है—निर्वाचन आयोग की बार-बार बदलती तारीखों और फैसलों का आखिर मकसद क्या है?
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चुनावी प्रक्रियाओं में तारीखों का खेल
राज्य में आरक्षण से लेकर मतदाता सूची तक हर प्रक्रिया को लेकर एक अलग ही ड्रामा चल रहा है।
1. नगरीय निकाय का आरक्षण: दो बार तारीख बदली गई। जनता इंतजार करती रही, और आखिरकार प्रक्रिया पूरी हुई।
2. सरपंच का आरक्षण: पूरी तैयारी के बाद रात 8 बजे अचानक प्रक्रिया रद्द कर दी गई।
3. पंच का आरक्षण: यहां भी दो बार तारीख बदली गई, और फिर कहीं जाकर प्रक्रिया हुई।
4. अध्यक्ष का आरक्षण: जैसे तारीख बढ़ाना ही नियम बन गया हो। जनता बस नई तारीख सुनने की आदत डाल चुकी है।
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मतदाता सूची और बैलेट बनाम EVM का मसला
मतदाता सूची जारी करने की तारीख भी लगातार आगे बढ़ाई जा रही है। लोग अब 18 तारीख को इसे लेकर संशय में हैं।
पहले कहा गया था कि चुनाव बैलेट पेपर से होंगे, लेकिन अब अचानक EVM का ऐलान कर दिया गया। इससे जनता के बीच भ्रम और बढ़ गया है।
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सेटिंग और शक का माहौल
जब आरक्षण प्रक्रिया हुई, तो कई लोगों ने इसे ‘सेटिंग’ का नतीजा बताया। दबी जुबान में सवाल उठने लगे कि कहीं आरक्षण में कोई गड़बड़ी तो नहीं हुई? नुक्कड़ों पर लोग इसे लेकर बहस कर रहे हैं, और पूरा मामला मजाक का विषय बन गया है।
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कॉमेडी या जनता का मजाक?
जनता का कहना है कि निर्वाचन आयोग खुद अपनी प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं ले रहा। इस बार का चुनाव किसी कॉमेडी शो से कम नहीं लग रहा।
नेता भी हो रहे हैं परेशान
आरक्षण और चुनावी प्रक्रिया में हो रही देरी से सिर्फ जनता ही नहीं, बल्कि नेता भी बुरी तरह परेशान हैं। उम्मीदवारों का कहना है कि वे अपनी तैयारी और प्रचार कैसे करें, जब हर बार नई तारीखों का ऐलान कर दिया जाता है। उनका शेड्यूल बिगड़ रहा है, और हर दिन नया संशय बना रहता है।
छत्तीसगढ़ में यह ‘तारीख पर तारीख’ का खेल कब खत्म होगा, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल, जनता इसे सहने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती।