
📍मुंगेली।त्योहारों की छुट्टियों को सार्थक बनाते हुए सेमरसल के शिक्षकों ने इस बार दीपावली अवकाश को ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक अनुभव से भरी यात्रा में बदल दिया। शिक्षकों के इस दल ने बस्तर के दुर्गम पहाड़ों, झरनों और जनजातीय जीवन की अनोखी झलक को करीब से देखा और महसूस किया।

शिक्षकों ने बताया कि इस भ्रमण का उद्देश्य बस्तर की सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय गौरव और प्राकृतिक संपदा को जानना तथा शैक्षणिक दृष्टि से नए अनुभव प्राप्त करना था।
यात्रा के दौरान दल ने चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, तामड़ाघुमर जलप्रपात, बारसूर के गणेश मंदिर, बत्तीसा मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, कुटुमसर गुफा, टाटामारी हिल स्टेशन और दंतेश्वरी मंदिर जैसे प्रसिद्ध स्थलों का दर्शन किया।

विशेष आकर्षण रहा दंतेवाड़ा के पास 3000 फीट ऊंचाई पर स्थापित विशाल गणेश प्रतिमा का दर्शन, जहां से शिक्षकों ने प्राकृतिक सौंदर्य का मनमोहक दृश्य देखा।
शिक्षकों ने राजमहल जगदलपुर में ऐतिहासिक महाराजा प्रवीणचंद्र भंज देव जी के दरबार का अवलोकन भी किया।
साथ ही डंकिनी-शंखिनी संगम, मुनगाबहार नदी, इंद्रावती नदी, भैरव बाबा मंदिर और झीरम घाटी जैसे स्थानों का भ्रमण किया।

बस्तर के साप्ताहिक हाट बाजार और हस्तशिल्प प्रदर्शनी में शिक्षकों ने स्थानीय कारीगरों से मुलाकात की और पारंपरिक बस्तरिहा संस्कृति, पहनावा व रहन-सहन की गहराई से जानकारी ली।
इस भ्रमण के दौरान शिक्षकों ने प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहर और बस्तर की सांस्कृतिक झलकियों को कैमरे में भी कैद किया।
इस शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक यात्रा में प्रधानपाठक आत्माराम कश्यप, शिक्षक राकेश पांडेय, राजकुमार कश्यप, उमाशंकर सिंह एवं नरेंद्र ध्रुव सम्मिलित रहे।

शिक्षकों का कहना था कि यह यात्रा न केवल अविस्मरणीय रही, बल्कि शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक भी साबित हुई — जिसने उन्हें “भारत की असली सांस्कृतिक आत्मा” से जोड़ने का अवसर दिया।


