ब्रेकिंग न्यूज

दिल्ली से उठी शिक्षा की चिंगारी, अब मुंगेली में छात्रों का हुंकार! 6 वर्षों से शिक्षक संकट, अब कलेक्टर कार्यालय तक पहुंची बच्चों की आवाज

हाई प्रोफाइल मुंगेली जिले में शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल—जब बच्चों को ही शिक्षक मांगने सड़क पर उतरना पड़े तो जिम्मेदार कौन?

मुंगेली। देशभर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही आवाजों और दिल्ली में छात्रों के आंदोलनों के बीच अब छत्तीसगढ़ का हाई प्रोफाइल जिला मुंगेली भी शिक्षा संकट को लेकर सुर्खियों में है। जिस जिले का प्रतिनिधित्व केंद्रीय राज्य मंत्री, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और लगातार सातवीं बार के विधायक जैसे बड़े जनप्रतिनिधि करते हों, उसी जिले के पथरिया विकासखंड के एक शासकीय विद्यालय की तस्वीर सरकारी दावों की पोल खोल रही है।

बच्चों के अनुसार, पिछले लगभग छह वर्षों से विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। कई वर्षों तक कक्षा पहली से दसवीं तक की पढ़ाई केवल एक शिक्षक के भरोसे चलती रही, और इस नए शैक्षणिक सत्र में तो हालात और भी गंभीर हो गए। स्कूल खुलने के करीब एक माह बाद भी विद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं है।

आखिर छात्रों को ही क्यों संभालना पड़ा मोर्चा?

जब स्कूल में पढ़ाने वाला कोई नहीं बचा, तब छात्रों ने खुद अपने भविष्य की लड़ाई लड़ने का फैसला किया। हाथों में आवेदन लेकर छात्र-छात्राएं मुंगेली कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और शिक्षकों की तत्काल नियुक्ति की मांग की। यह दृश्य कई सवाल छोड़ गया—क्या अब बच्चों को पढ़ाई छोड़कर अपने अधिकारों के लिए प्रशासन के दरवाजे खटखटाने होंगे?

मुंगेली मॉडल या शिक्षा व्यवस्था की विफलता?

यह सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र का है। यदि किसी विद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं है, तो फिर हाल ही में हुए युक्तियुक्तकरण का उद्देश्य क्या था? क्या विभाग को इस विद्यालय की स्थिति की जानकारी नहीं थी, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखी की गई?

जवाब चाहिए…

  • छह वर्षों से शिक्षक संकट क्यों बना रहा?
  • विभागीय समीक्षा बैठकों में इस विद्यालय का मुद्दा क्यों नहीं उठा?
  • क्या बच्चों का भविष्य केवल आश्वासनों के भरोसे छोड़ा जाएगा?
  • क्या इस गंभीर लापरवाही के लिए किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी?

अब पूरा मुंगेली यह जानना चाहता है कि प्रशासन का “एक सप्ताह में व्यवस्था करेंगे” वाला आश्वासन जमीन पर कब दिखाई देगा। क्योंकि सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य का है, जो किताबों की जगह आवेदन लेकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो गए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!