
प्रदेश में इन दिनों एक नई तरह की “नेतागिरी” चर्चा में है। यह नेतागिरी दो रूपों में सामने आ रही है—एक बिना किसी पद के दबाव बनाकर काम निकालना, और दूसरी किसी संगठन या पद का सहारा लेकर विभागों में ग्यापन सौंपना, जांच की मांग करना और फिर चुपचाप “सेटलमेंट” कर लेना। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह जनहित की लड़ाई है या एक संगठित ब्लैकमेलिंग का तरीका?
ग्यापन से शुरू, सेटलमेंट पर खत्म
पिछले कुछ समय में कई विभागों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कुछ लोग अचानक सक्रिय होकर किसी अधिकारी या काम के खिलाफ ग्यापन देते हैं। ग्यापन में अक्सर “जांच की मांग”, “उग्र आंदोलन की चेतावनी” और “जनहित” जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि कुछ ही दिनों में मामला शांत हो जाता है। न कोई आंदोलन होता है, न जांच की रिपोर्ट सामने आती है—बस मामला “सेटल” हो जाता है।
पद मिलते ही बदल जाता है खेल
सूत्रों के अनुसार, जैसे ही कुछ लोगों को किसी संगठन में छोटा-मोटा पद मिलता है, वे तुरंत नया लेटरपैड छपवाकर अलग-अलग विभागों में सक्रिय हो जाते हैं।
इन ग्यापनों के जरिए दबाव बनाया जाता है और फिर पर्दे के पीछे बातचीत का दौर चलता है।
सिर्फ एक पक्ष नहीं, दोनों जिम्मेदार
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे खेल में केवल तथाकथित “नेता” ही दोषी नहीं हैं, बल्कि कुछ हद तक विभागीय लापरवाही भी जिम्मेदार है।
अगर हर शिकायत की पारदर्शी जांच हो और परिणाम सार्वजनिक किए जाएं, तो ऐसे मामलों की गुंजाइश कम हो सकती है।
“चुटभैया नेतागिरी” का बढ़ता चलन
स्थानीय स्तर पर कई ऐसे लोग सक्रिय हैं, जिनका मुख्य काम ही ग्यापन देना और दबाव बनाना बन गया है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—इनकी भूमिका हर जगह समान रहती है।
जनता के मुद्दों से ज्यादा ध्यान “सेटलमेंट” पर होता है, जिससे असली समस्याएं पीछे छूट जाती हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही है ब्लैकमेलिंग?
इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं:
प्रशासनिक ढिलाई: शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई का अभाव
राजनीतिक संरक्षण: छोटे स्तर पर भी प्रभाव दिखाने की होड़
आर्थिक लालच: आसान कमाई का जरिया बनता जा रहा है
जवाबदेही की कमी: ग्यापन देने वालों की नीयत और परिणाम की जांच नहीं होती
इस तरह की गतिविधियों का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है।
वास्तविक समस्याएं और शिकायतें इस शोर-शराबे में दब जाती हैं, जबकि ईमानदार अधिकारी भी अनावश्यक दबाव में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि:
हर ग्यापन को ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम से जोड़ा जाए
जांच और कार्रवाई को पब्लिक डोमेन में लाया जाए
फर्जी शिकायत या ब्लैकमेलिंग साबित होने पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो
जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय की जाए
नेतागिरी का असली उद्देश्य जनसेवा है, लेकिन जब यह “दबाव और सेटलमेंट” का माध्यम बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
जरूरत है पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्ती की—ताकि ग्यापन की राजनीति जनहित की राह पर लौट सके, न कि ब्लैकमेलिंग का हथियार बने।


