
रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित पंडवानी की महान लोकगायिका तीजन बाई का रविवार तड़के 3:15 बजे रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रही थीं और उपचाररत थीं। उनके निधन से पूरे छत्तीसगढ़ सहित देशभर के कला एवं सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
दुर्ग (वर्तमान बालोद क्षेत्र) के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई के पिता हुनुकलाल परधा और माता सुखवती थीं। बचपन में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनीं और वहीं से पंडवानी गायन के प्रति उनका गहरा लगाव शुरू हुआ। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया।
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया। आगे चलकर उनकी कला ने देश-विदेश में छत्तीसगढ़ की पहचान बनाई। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रस्तुति देखकर उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाया, जिसके बाद उनके जीवन ने नई उड़ान भरी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन किया।
तीजन बाई को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), नृत्य शिरोमणि सम्मान (2007) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया। उन्होंने अपने जीवनभर पंडवानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोककला और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई।
उनके निधन को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। प्रदेशभर से राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत की हस्तियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।


